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Wednesday, May 18, 2011

क्या सच मैं एक नौजवान की नज़र मैं उसके अपने बेटे और बाप का दर्जा एक सामान हुआ करता है?

question mark किसी नौजवान की ज़िंदगी से उनके बूढ़े बाप और औलाद का जुड़ा होना एक आम सी बात है.खून के रिश्ते से तो दोनों रिश्ते सामान अहमियत रखते हैं लेकिन क्या सच मैं एक नौजवान की नज़र मैं उसके अपने बेटे  और  बाप का दर्जा एक सामान हुआ करता है?

दर्जा तो बाप का ही बड़ा है लेकिन अहमियत और मुहब्बत अपनी औलाद से अधिक हुआ करती है ऐसा इस समाज मैं रह रहे लोगों को देख के महसूस हुआ करता है.अपना बेटा तो अपनी ज़िम्मेदारी है यह सब समझते हैं लेकिन अपना बुढ़ा बाप भी अपनी ही ज़िम्मेदारी है यह बहुत कम लोग महसूस  किया करते हैं. 

बच्चा बूढा एक सामान कहा जाता है और इसका कारण यही  है की एक बूढ़े व्यक्ति का जिस्म भी कमज़ोर हो चुका होता है, और दिमाग  भी. जैसे एक बच्चे के लिए सहारे के बिना चलना संभव नहीं होता , बूढ़े व्यक्ति के लिए भी सहारे की आवश्यकता हुआ करती है. 

बच्चे  को तो बाप का सहारा हर हाल मैं मिल ही जाता है लेकिन वही बच्चा जब बड़ा होता है और उसको सहारा देने वाले मां बाप बूढ़े तो वही बच्चा अपनी बूढ़े बाप की  देख रख को एक बोझ समझता है. औलाद बड़ी होने पे कैसी निकलेगी किसी को नहीं पता होता लेकिन मां बाप का प्यार तो सभी देख चुके होते हैं फिर भी अपने बच्चे को पालना, उसके लिए खुद को कुर्बान कर देना जब बोझ नहीं लगता है तो बूढ़े मां बाप की ज़िम्मेदारी   एक बोझ क्यूँ? क्या कोई ब्लॉगर इस पे प्रकाश डालेगा?

5 comments:

Dr Kiran Mishra said...

ye bhautikwadi samaj hi nhi ajatshatru ke samay se chali aa rhi samasya hai

Shah Nawaz said...

अक्सर इसका कारण वैचारिक मतभेद भी होता है...

Muhammad Ali said...

इस्लाम में तो इस बारे में काफी निंदा की गई है यहां तक ​​के कुरान में अल्लाह फ़रमाता है कि अपने माता पिता को उफ़ तक न कहो,,,,,,,,

Bhushan said...

कारण के तौर पर बताया जा सकता है कि बूढ़ों का जीवन सक्रिय नहीं रहता जबकि युवाओं का सक्रिय होता है. सक्रिय जीवन पीछे कम देखता है. उसके पास समय की कमी होती है. बूढ़ों के पास समय बहुत होता है और एनर्जी कम. समय के भार को कम करने के लिए लिए उन्हें साथी चाहिए होता है. सक्रिय जीवन चाह कर भी उन्हें साथ नहीं दे पाता. उसका दायरा भी दौड़-भाग वाला होता है. एक मज़ेदार बात यह है कि बूढ़ों की नींद स्वाभाविक ही कम हो जाती है. प्रातः 03 बजे नींद खुल जाती है. यदि कोई रूटीन बनाया हुआ है तो ठीक, नहीं तो बच्चों से शिकायत कि वे प्रातः नहीं उठते. मैं भी इसी दिशा में जा रहा हूँ अतः कुछ सच्चाई कह सकता हूँ.

सुशील बाकलीवाल said...

इसी लिये कहा जाता है कि एक पिता अपने चार पुत्रों को पाल सकता है किन्तु चार पुत्र मिलकर भी एक पिता को नहीं पाल पाते ।