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    Wednesday, September 29, 2010

    कहीं हम अपनी पहचान तो नहीं खोते जा रहे ?

    Apni tahzeeb

    आज के नौजवानों कि बोलीं बदलती जा रही हैं. अब वोह विश्व स्तर पे सोंचता और वैसी ही बोली बोलता है. लेकिन कभी अपनी बोली को विश्व स्तर पे ले जाने कि बात नहीं सोंचता? .

    आज का नौजवान, जब किसी कि सुन्दरता कि तारीफ करता है तो अति सुंदर, माशाल्लाह कि जगह कहता है, इट्स हॉट तो सेक्सी.
    शायद आज हमारा नौजवान हीनता का शिकार होता जा रहा है.

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    3 comments:

    Udan Tashtari said... September 29, 2010 at 8:46 AM

    कहीं न कहीं कुछ हीनता का भाव तो है...

    S.M.MAsum said... September 29, 2010 at 9:32 AM

    समीर जी आपने सही कहा है?

    Shah Nawaz said... September 29, 2010 at 10:10 AM

    अपनी संस्कृति और रिवाजों की कद्र अंग्रेजों की गुलामी में पीछे छूटती जा रही है और इसको तरक्की का नाम देकर ख्वाब दिखाए जा रहे हैं.

    ज़रा यहाँ भी नज़र घुमाएं!
    राष्ट्रमंडल खेल

    Item Reviewed: कहीं हम अपनी पहचान तो नहीं खोते जा रहे ? Rating: 5 Reviewed By: M.MAsum Syed
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