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Monday, May 28, 2012

मैं लोगों के वेयूज़ लेकर क्या करूँगा |


मैं लोगों के वेयूज़ लेकर क्या करूँगा |

जी हाँ हमरे बहुत से ब्लॉगर ऐसे हैं जो टिपण्णी पाने के लिए अजीब अजीब हथकंडे अपनाते हैं |दिन भर दूसरों के लिख पे टिपण्णी किया करते हैं चाहे उनकी कविता या लेख पसंद हों या न हों | नतीजा यह होता है कि टिपण्णी करने वाला और पाने वाला दोनों जानते हैं कि यह टिपण्णी उनके लेख या कविता का सही मूल्यांकन नहीं है |
यदि कोई टिपण्णी आपके लिख के बारे में सच न कह सके तो ऐसी टिपण्णी का लेना देना दोनों समय कि बर्बादी है| शायद इस बात को महसूस करते हुए महफूज़ जी ने कहा कि मैं लोगों के वेयूज़ लेकर क्या करूँगा |
 टिपण्णी करते समय न दोस्ती देखें, न यह विचार मन में लाए कि  सामने वाले की  टिपण्णी का  उधार चुकाना है या यह मेरे ब्लॉग पे टिपण्णी नहीं करता ,तो मुझे विश्वास है ऐसी कि ऐसी ईमानदार टिपण्णी इस ब्लॉगजगत को सही दिशा देगी और महफूज़ भाई भी कहने लगेंगे मुझे भी लोगों के व्यूज़ चाहिए |   

Wednesday, May 16, 2012

दशक के हिन्दी चिट्ठाकार वास्तविकता या बाजारवाद की पराकाष्ठा?


दशक के हिन्दी चिट्ठाकार वास्तविकता या बाजारवाद की पराकाष्ठा?
अच्छे लेखकों को पुरस्कार दे के उनका उत्साह बढ़ाना एक बेहतरीन काम है और यदि इस ब्लॉगजगत में कोई इसे इमानदारी के साथ करता है तो इससे हिंदी ब्लॉगजगत का  काफी भला हो  सकता है | बहुत से ब्लॉगर पिछले ८-९ सालों से अपने अपने ब्लॉग से अनेक विषयों पे लिखते रहे हैं | यहाँ तक कि फिल्म एक्टर और पत्रकार भी अपने हिंदी ब्लोग्स पे लिखा करते हैं | आज ब्लॉग अभिव्यक्ति, सूचना, संचार और जानकारी का स्वतंत्र और मर्यादित माध्यम साबित हों रहा है |

ऐसे में दशक के हिंदी चिट्ठाकारों का चुनाव आसान काम नहीं | सबसे पहले तो आप को इस बात की  जानकारी होना चाहिए कि हिंदी ब्लॉगजगत में कितने ब्लॉग हैं और उनके कितने पाठक हैं ?
यह मान के चलना कि हम जिन जिन को जानते हैं या जिन जिन से हमारा संपर्क है या जो हमारे आप पास आ के हमारे ब्लॉग को पढते है और टिपण्णी किया करते हैं वही केवल हिंदी ब्लॉगजगत में ब्लॉगर कि हैसीयत रखते हैं गलत होगा |   
हाँ  यदि आप दशक के केवल उन हिंदी चिट्ठाकारों में से चुनाव करते हैं जिन्हें आप पसंद करते हैं या जो आपके मित्र हैं या आप जिनको खुश करना चाह रहे हैं तो आप को यह बात साफ़ साफ़ सभी को बता देनी  चाहिए |
यह काम न तो इतना आसान है और न ही इतने छोटे पैमाने पे किया जा सकता है | इसके लिए समय भी चाहिए, हिंदी चिट्ठाकारों के बारे में सही ज्ञान भी होना चाहिए और ईमानदारी भी | वोटिंग के नतीजो में पारदर्शिता आवश्यक है डूप्लीकेट वोटिंग इत्यादि कि संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता |

यदि किसी चुनाव में इन बातों पे ध्यान न दिया जाए तो इसी केवल बाजारवाद का नाम दिया जा सकता है | इस से हिंदी ब्लॉगजगत को कोई फायदा तो होने वाला नहीं हाँ नुकसान अवश्य हों सकता है |
फुरसतिया ब्लॉग का यह स्वस्थ व्यंग बहुत कुछ कह गया |

Friday, May 11, 2012

एक निवेदन !




एक निवेदन !

आपके लिखे गए ब्लॉग पोस्ट बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार कमेंट्स से बेहतर जागरूक लेखकों  कि पोस्ट लगती हैं,पोस्ट लिखते  समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, पोस्ट लिखते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी पोस्ट  समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है ! :)


- एस एम् मासूम 

Thursday, May 3, 2012

सतना जिले का अजीब गांव बेटी की शादी करने की जगह बेटी बेचने कि प्रथा


सतना जिले का अजीब गांव बेटी की शादी करने की जगह बेटी बेचने कि प्रथा

देश का हृदय कहा जाने वाला मध्य प्रदेश के पथरौंधा गांव में बेटी को ब्याहने के बजाय बेचने की शर्मनाक प्रथा मौजूद है। यह अजीबो गरीब गांव सतना जिले में नौगद मैहर रोड में नौगद से लगभग 11 कि मी कि दूरी पर है। आम तौर पर बेटे के जन्म पर जश्न मनाया जाता है, लेकिन इस गांव में बेटी के जन्म पर जश्न मनाया जाता है। कारण है कि बेटी कमाकर उनका पेट भरेगी।

हर लड़की की यही हसरत होती है कि उनके घर बारात आए, अपने राजकुमार के साथ डोली में बैठकर ससुराल विदा हो और एक नई जिंदगी की शुरुआत करें। लेकिन सतना जिले के पथरौंधा गांव की कहानी ही कुछ और है। यहां बेटी के किशोरावस्था में आते ही उसे मुम्बई भेज दिया जाता है, जहां अय्याश किस्म के अमीर बोली लगा कर महंगे दाम पर खरीदते हैं और फिर शुरु हो जाता है अमानवीय खेल। इस अमानवीय खेल से मिलने वाले पैसे के एक हिस्से से परिवार का गुजर बसर होता है। इस अमानवीय खेल की प्रथा को कायम रखने के लिए बिरादरी में अपना एक तानाशाही कानून है जिस कानून के तहत बेटी का ब्याह करना बहुत बड़ा गुनाह है।
आज के इस आधुकनिक दौर में भी ऐसी मानसिकता के लोगों की मौजूदगी इस बात का एहसास कराती है कि पुरुष प्रधान समाज नारी जाती को किस प्रकार के रुढ़िवादी प्रथाओं की जंजीर में बांधकर शोषण करता रहा है।