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Thursday, March 31, 2011

मीना कुमारी कि ज़िंदगी और मौत -एक सवाल?

meena1 मीना कुमारी का नाम आज भी लोग नहीं भूलें हैं. अपने वक़्त कि बेहतरीन अदाकारा जिसने ९३ फिल्मों मैं काम किया ,जब पैदा हुई तो उसके माँ बाप के पास उस डॉ को देने के पैसे नहीं थे ,जिस नर्सिंग होम मैं वो पैदा हुई थीं और जब दुनिया से गयी तो मीनाकुमारी के इलाज का खर्च जो अस्पताल ने बताया उसको भरने के पैसे भी नहीं थे.

मीना कुमारी अपने माता पिता अली बक्श और इकबाल बेगम कि तीसरी संतान थी. इनका असल नाम महेजबीं बानों था. १ अगस्त १९३२ को जन्मी मीना कुमारी का देहांत ३१ मार्च १९७२ मैं उस समय हुआ जब उनकी फिल्म पाकीज़ा को परदे पे आये तीन सप्ताह हुए थे , दुनिया उनकी फिल्म देखने को दीवानी हुई जा रही थी,और मीनाकुमारी बीमारी और  ग़रीबी से अकेले लड़ रही थी.

जनाब कमाल अमरोही साहब से उनकी शादी १९५२ मैं हुई और जल्द ही १०६० मैं तलाक भी हो गया.जिसको मीना कुमारी ने कुछ ऐसे बयान किया..

 

तलाक़ दे तो रहे हो ग़ुरूर ओ क़ह्र के साथ

मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मह्र के साथ

 

मीना कुमारी के खुद के अल्फाज़ों मैं उनकी कहानी ऐसी है कि वो कहती थी. 

 

तुम  क्या  करोगे  सुनकर  मुझसे  मेरी  कहानी

बेलुत्फ  ज़िन्दगी  के  किस्से  हैं  फीके  फीके


mina जो कमाल अमरोही साहब मीना कुमारी का साथ ज़िंदगी में  ना दे सके आज मरने के बाद साथ में ही दफन हैं.


ये कैसी  दुनिया है यह कैसे लोग हैं, किसे कहते हैं शोहरत किसे कहते हैं दौलत और किसे कहते हैं मुहब्बत, मीना कुमारी कि ज़िंदगी के हर पहलु को देखने के बाद यह सब एक बड़े सवाल के रूप मैं उभर के सामने  आता है. आज भी मीनाकुमारी का ज़िक्र एक बेहतरीन अदाकारा और बेहतरीन शायरा के रूप मैं किया जाता है. लेकिन उनकी ज़िंदगी मैं ना तो कोई उनका हमदर्द था और ना ही किसी को उनसे मुहब्बत, वरना ऐसी ग़ुरबत मैं वो दुनिया से ना जाती.  

यह दुनिया जिसकी दिवानी थी वो ज़िंदगी मैं भी अकेली और ग़रीब रही और मरने के बाद भी उसकी कब्र अकेली ही नज़र आती है. दौलत और शोहरत के पीछे भागने वाली इस दुनिया मैं रहने वालों के लिए मीनाकुमारी कि ज़िंदगी एक इबरत है.

Wednesday, March 30, 2011

आज मिलिए हिंदी ब्लॉगजगत के सबसे जोशीले ब्लोगर से

akhtarkhan3 हिंदी ब्लॉगजगत कि एक बात मुझे बहुत पसंद  और वो है अपने साथियों के ब्लॉग पे नियमित तौर पे आना जाना और टिप्पणी करना. लेकिन मुझे यह बात कभी पसंद नहीं आयी कि टिप्पणी अधिकतर उन्ही ब्लोगर के लेख़ पे करना जिन ब्लोगर को हम जानते हैं या जिनसे वापस  टिप्पणी मिलने कि आशा हो. यह काम हम जा बूझ  के नहीं करते बल्कि जाने अनजाने मैं सबका  देखा देखी इसकी आदत सी पड़ जाती है. और फिर इस चक्कर से हम कभी नहीं निकल पाते. हमें पता  ही नहीं चलता कि कब कौन सा नया ब्लोगर इस ब्लॉगजगत मैं आया और क्या लिख रहा है. 

बहुत दिनों से एक ब्लोगर जनाब अख्तर खान "अकेला" जी को पढता हूँ. एक साल पहले जब मैं  इस हिंदी  ब्लॉगजगत मैं आया तो यही समझ मैं आता था जिसके पास १००-२०० टिप्पणी हैं वो बड़ा ब्लोगर है और अच्छा लिखता भी है,जिसके पास कोई टिप्पणी नहीं वो अच्छा नहीं लिखता. मैंने भी इसी तराजू से जनाब अख्तर खान अकेला का वज़न करने कि भूल कर डाली. और नतीजे मैं ३-४ महीने उनके अच्छे लेखों को नहीं पढ़ा. धीरे धीरे पता  चलने लगा, जनाब अख्तर खान साहब, को ब्लॉग बना लेना सही से नहीं आता, टिप्पणी कहां और कैसे कि जाए, इस ब्लॉगजगत का क्या दस्तूर है, यह भी नहीं मालूम. उनको तो केवल बेहतरीन लिखना और पोस्ट कर देना भर ही आता है. 

एक दिन जब अख्तर साहब का लेख "में हिन्दुस्तान हूँ…में मुसलमान हूँ…कहां हिन्दू कहां मुस्लमान " अमन के पैग़ाम के लिए मिला , तो मुझे उनके विचार बहुत पसंद आये और मुझे यकीन हो गया कि इनको पहचानने में मैं ग़लती कर गया. 

sadafakhtar जनाब अख्तर खान साहब पेशे से वकील, उर्दू, हिन्दी एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर, विधि स्नातक, ह्यूमन रिलीफ सोसायटी का महासचिव हैं . लेकिन मेरी नज़र मैं इनकी पहचान केवल इनकी बेहतरीन और इमानदार लेखनी है. किसी से नाराज़गी ना होने के बावजूद किसी ख़ास समूह से जुड़े ना होने के कारण , इनके लेखों को टिप्पणी कम ही मिल पाती है लेकिन जो एक बार इनको पढ़ लेता है , दूसरी बार तलाशता हुआ जाता है. बस मेरी ही तरह हिंदी टाइपिंग मैं ग़लतियाँ ,टाइपिंग का तजुर्बा ना होने के कारण अक्सर हो जाया करती है.

अख्तर खान साहब एक सीधी तबियत के इंसान हैं और जो कुछ लिखते हैं अपने ब्लॉग पे वही उनकी सही पहचान भी है. उनके ब्लॉग से ही पता  लगता है वो अपने परिवार और अपने देश, अपने वतन से भी बहुत प्यार करते हैं. 

अक्सर बा सलाहियत लोगों के बारे मैं बहुत सी ऐसी बातें भी मशहूर हो जाती हैं जिनका यह पता   भी नहीं चलता कि सच है या झूट. वैसे तो अख्तर साहब शायर भी हैं और "अकेला" उनका तखल्लुस है लेकिन सुना है जब साल भर से बेहतरीन लिखने के बावजूद लोगों ने टिप्पणी कम लिखी तो उन्होंने ने अपने नाम  के आगे "अकेला" लगा लिया.

यह वो शख्स है जिसने ब्लॉगजगत के दस्तूर  को अकेला बदल डाला. कोई टिप्पणी करे ना करे इनकी लेखनी और जोश मैं कोई अंतर नहीं आया और आज हर एक ब्लोगर इनको नाम से भी जानता है और इनकी लेखनी कि ताक़त को भी मानता है. और टिप्पणी कम होने के बाद भी इनके ब्लॉग के पाठक किसी भी अधिक टिप्पणी वाले ब्लॉग से ज्यादा हैं.

जिन्होंने इनको नहीं पढ़ा है ,उनसे यह अवश्य कहूँगा, एक बार अख्तर  साहब को अवश्य पढ़ें ,आप इनके लेख और कविताओं को किसी १००-१५० टिप्पणी वाले ब्लोगर से कम नहीं पाएंगे.

अभी अभी खबर मिली कि पाकिस्तान से सेमीफाईनल जीत कर  भारत फाईनल में पहुँच गया है। आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ

Tuesday, March 22, 2011

पठान का डंडा और मामला ठंडा

pathan उपदेश और नसीहतों के बीच कभी कभी थोडा हंस भी लेना चाहिए. 

किसी गाँव मैं एक साहब ने खुद के भगवान् होने का  का एलान कर दिया,कहने लगे कि वो भगवान् हैं. दूर दूर से लोग आते और उसको समझाते कि तुम ग़लत हो, दूर देश से धर्म के ज्ञानी बुलाये गए लेकिन वो मान ने को तैयार नहीं कि वो खुदा नहीं है.

वहीं गाँव मैं एक दुखी पठान रहता था . दुखी इस लिए कि उसका बेटा अभी कुछ दिनों पहले चल बसा था. उसने भी यह बात सुनी कि एक साहब ने भगवान् होने का  दावा कर दिया है. उस पठान ने कुछ सोंचा और अपनी लाठी हाथ मैं ले के उन साहब से मिलने गया.

वहां देखा लोग उसको समझा रहे हैं, पठान ने सब से कहा , मुझे भी एक मौक़ा दो इन भगवान् जी से मिलने का. सब मान गए. 

पठान ने पूछा तो आप खुद को भगवान् कहते हैं?

उन साहब का जवाब था हाँ.

पठान के डंडा ऊपर उठाया और कहा "तो तुम्ही हो जिसने मुझसे मेरा बेटा छीन लिया" 

इस से पहले कि पठान आगे बढ़ता उन साहब ने चिल्ला के कहा  नहीं भाई मैं ना तो भगवान् हूँ और ना ही मैंने तुम्हारा बेटा छीना है..

Sunday, March 20, 2011

नवरोज़ और होली कि बधाई

यह संयोग ही है कि इस सप्ताहंत और नवरोज़ मनाया जा रहा है.अभी आज रात हमारे हिन्दू भाइयों ने होली कि ख़ुशी मनाई और अब २१ मार्च को पारसी अपना नववर्ष नवरोज़ मना रहे हैं.

सभी को होली और नवरोज़ कि बधाई.

Sunday, March 13, 2011

साझा ब्लॉग आप की जागीर नहीं और खतरा अलग से part 2


मैंने अपनी पिछली पोस्ट मैं कहा था कि यदि आप किसी साझा ब्लॉग के संयोजक हैं तो आप जैसे ही किसी को मेम्बर बनाते हैं आप जाने या अनजाने मैं उसको यह ताक़त दे देते हैं कि वोह एक क्लिक पे आप के ब्लॉग कि सभी पोस्ट अपने किसी ब्लॉग पे खींच ले. इसके लिए admin बनाने कि भी आवश्यकता नहीं.
अब तो सरकार  भी इस कानून को लाने कि सोंच रही है के आप के खुद के ब्लॉग मैं प्रस्तुत विषय वस्तु कि पूरी ज़म्मेदारी आप कि ही होगी और साझा ब्लॉग चाहे साझा हो , है तो वो संयोजक का ही ब्लॉग, इस लिए इस बात कि आशंका अधिक है कि , जवाबदेही संयोजक पे आये.


जैसा के मैंने पहले भी कहाँ था कि ऐसे लिखने वाले कम ही हैं जो कोई लेख़ केवल किसी साझा ब्लॉग के लिए लिखें. लोग लेख़ लिखते हैं और अपने ब्लॉग के साथ साथ , कई साझा ब्लॉग पे भी डाल देते हैं.



ध्यान रहे आप के ऐसा करने से आप अपने ब्लॉग के पाठक  भी खो देते हैं और साझा ब्लॉग कि अपनी पहचान भी खो जाती है. साझा ब्लॉग के संयोजको को यह ध्यान रखना चाहिए कि अपने ब्लॉग पे बुलाया भी आपने ही है किसी को तो ज़िम्मेदारी भी आप कि ही होगी. यदि आप दूसरों के लेख़ कि ज़िम्मेदारी ना ले सकते हों तो कम लोगों को ही बुलाएं.
जब आप का सहयोगी आप का पहचाना हुआ होगा तो ब्लॉग कि पोस्ट चोरी का भी खतरा कम और जवाबदेही भी आसान हो जाएगी.

Friday, March 11, 2011

मैंने भी टिप्पणी गिननी शुरू कर दी


tippani अधिक टिप्पणी वाले ब्लॉग भी संकलक की तरह ही काम करते हैं. भाई ऐसा इसलिए कह रहा हूँ की ब्लोगर stat यह बताता है की जब आप ऐसे किसी ब्लॉग पे टिप्पणी कर दें जहां  ६०-११०-१५० टिप्पणी आती हो तो १०-१२  टिप्पणी करने वाले ब्लोगर आप के ब्लॉग तक भी आ पहुँचते हैं वहीं से  तलाशते हुए. 
इस सप्ताह मैंने मैंने भी सोचा  नए  ब्लोगर का उत्साह तो रोज़ टिप्पणी कर के बढ़ाते हैं चलो आज अपना उत्साह बढाया जाए अधिक टिप्पणी वाले ब्लॉग पे "अति सुंदर" "सराहनीय "लिख कर.
सबसे पहले पहुंचा समीर लाल के पास देखा एक दिन मैं ४५ टिप्पणी, लगा अपना काम हो गया, फ़ौरन कलम संभाली बटन दबाया लिखा "अति सुदर" साथ मैं सराहनीय भी जोड़ दिया. फिर ज़मीर ने आवाज़ दी भैया यह तो लिखता भी अच्छा है चलो पढ़ लें , देखा कुछ बुढ़ापे की कहानी है, तब तो और दिल किया पढो भैया बुढ़ापा तो अपने आने वाले  दिनों की निशानी है. एक सास मैं पूरा पढ़ गया.
उन्होंने लिखा अंत मैं "अक्षमतायें और असुरक्षा की भावना अपने साथ कितनी ही आशंकायें लेकर आती हैं " और यही बात मुझे पसंद आ गयी. टिप्पणी भी कर दी संतुष्ट भी हो गए चलो इमानदारी से कुछ कहा.
फिर सोंचा चलो सतीश सक्सेना के पास चलें , वहां गया तो देखा डाइमंड जुबली के साथ पिछली पारी ख़त्म हुई और नयी पारी के लिए बल्ला हाथ मैं संभाले खड़े हैं और कुछ होमिओपैथी  , आयुर्वेद की बातें बता रहे हैं, दिल का मरीज़ वैसे ही हूँ, सोंचा ,अपना आदमी है बाद मैं  कुछ आराम से कहेंगे.  लेकिन वहां भी एक नसीहत दिख ही गयी.
"मानव चाहे तो क्या नहीं कर सकता ......आवश्यकता सिर्फ सामूहिक ताकत का उपयोग करने का ही है , रास्ता निकल ही आएगा  "

अचानक किसी ने कहा सुनामी आया मैंने कहा भाई मालूम है जापान मैं , जनाब बोले अर्रे नहीं  हरकीरत ' हीर' जी के ब्लॉग पे , आयी हैं बाढ़ टिप्पणिओं की ,ज़लज़ले के साथ. भागा भागा  गया , मौक़ा अच्छा था और देखा तो सच १४१ टिप्पणी.  देखा  दमकल विभाग वाले वहां अभी नहीं आये हैं, सोंचा ज़रा सी आग बुझा दूं मैं भी, जबकि मालूम है हम जैसे छोटे लोग कहाँ इतनी बड़ी आग बुझा सकते हैं, लेकिन जितनी सलाहियत है उतनी कोशिश इंसान को अवश्य करनी चाहिये. और वहाँ भी कुछ कह आया.

लौटा अपने ब्लॉग पे देखा ० टिप्पणी  सोंच रहा था क्यूं? तभी कहीं  से आवाज़ आयी , जनाब  आप लिखते भी बहुत अच्छा नहीं है, किसी के धर्म को निशाना भी नहीं बनाते, अमन का पैग़ाम और उपदेश अलग से बाँट आते हैं. आप को तो -१४० टिप्पणी मिलनी चाहिए.

मैंने भी सोचा कोई बात नहीं  अच्छा लिख के अधिक टिप्पणी पाने की राह अभी भी  खुली है.. यदि आप को भी ऐसा लगता है तो आप सब भी कोशिश करें अच्छा लिखने की और अच्छे लेख पे अधिक टिप्पणी देने की.

जापान में जबर्दस्त भूकंप

पूर्वोत्तर जापान में 8.9 की तीव्रता वाले जबर्दस्तभूकंप के बाद सूनामी के चलते काफी नुकसान हुआ है। बताया जा रहा है कि पिछले 1 15 सालों में जापान में यहसबसे शक्तिशाली भूकंप है।

Thursday, March 10, 2011

साझा ब्लॉग आप की जागीर नहीं Blog Tips

wordpress घबराएं नहीं मैं किसी साझा ब्लॉग के खिलाफ नहीं लिखने जा रहा बल्कि यह बताना चाहता हूँ साझा ब्लॉग बना लेने के बाद आप की सभी पोस्ट पर से आप का अधिकार चला जाता है. 

आप जब भी कोई साझा ब्लॉग बनाते हैं तो आपको लगता है की आपने केवल उसे मेम्बर बनाया है और पोस्ट डालने का अधिकार दिया है. ब्लॉगर dashboard पे इस से अधिक कोई सुविधा नहीं दिखती. कम से कम आप उस ब्लॉग की पोस्ट को download नहीं कर सकते जब तक आप को admin power ना दी गयी हो.

लेकिन यह सत्य नहीं है. आप के सभी मेम्बर्स अपने साझा ब्लॉग की सभी पोस्ट आसानी से download भी कर सकते हैं और अपने किसी ब्लॉग पे अपलोड कर के एक नया ब्लॉग भी बना सकते हैं.

आप यदि इसके लिए तैयार हैं तो साझा ब्लॉग आप के लिए है और यदि आप यह नहीं चाहते की आप की सभी पोस्ट केवल एक click से चोरी हो जाए तो साझा ब्लॉग ना बनाएं और ना ही अपने ब्लॉग पे किसी को मेम्बर बनाएं

यह काम कैसे किया जाता है , यदि आप चाहेंगे तो अगले लेख मैं बताऊंगा.

यदि आप का ब्लॉग blogspot ,joomla. drupal. wordpress, multiply, blog.com, ning,InsaneJournal, Xanga,LiveJournal पे  बना  है  और  आप को कोई मुश्किल आ रही है तो आप मेरी सहायता ले सकते हैं. 

aman jaunpur

Wednesday, March 2, 2011

आज आप भी कुछ कहें क्या ख्याल है आप का ?

safe

आज आप कुछ कहें क्या ख्याल है आप का ?इस तस्वीर को देख आप के दिल मैं जो भी ख्याल आता है यहाँ लिखें?

Tuesday, March 1, 2011

बच्चे सभी को प्यारे लगते हैं परन्तु यदि वे उदार भी हों तो और अधिक अच्छे लगने लगते हैं।

बच्चे सभी को प्यारे लगते हैं परन्तु यदि वे उदार भी हों तो और अधिक अच्छे लगने लगते हैं।

PICT1911 क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने बच्चे की कन्जूसी पर चिन्तित हुए हों? और आप ने यह सोचा हो कि इसे किस प्रकार उदार बनाया जा सकता है? विशेषकर कि जब आप स्वंय उदारवादी हों।

अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे उदारता को अपने माता- पिता से सीखते हैं। जो बच्चे उदार परिवार में बड़े होते हैं वे निश्चित रूप से यह सीख लेते हैं कि किस प्रकार अपने मित्रों या सहकर्मियों के साथ उदारता पूर्ण व्यवहार करें और दूसरों की सहायता करें और किसी की धन सम्पत्ति पर निगाहें न गाड़े। यध्यपि आज के स्वार्थी और क्रूर विश्व में हम मनुष्यों को अपनी विभूतियों का मूल्य ज्ञात होना चाहिए परन्तु उनको ग़रीब लोगों के साथ बॉंट कर हम जीवन का अधिक आनन्द उठा सकते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि हम इस स्वार्थी विश्व में अपने बच्चों को किस प्रकार से दयालु और उदार बना सकते हैं?

यद्यपि वर्तमान युग में बच्चों को यह सिखाना बहुत कठिन है परन्तु असम्भव नहीं है।उदार और अपनीचीज़े दूसरों को देने वाले बच्चे केवल अपने हित के बारे में ही नहीं सोचते बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों तथा मित्रों को भी महत्व देते हैं। इन बच्चों ने सीखा है कि उदारता तथा भलाई से दूसरों को हर्ष प्राप्त होता है। बच्चों को उदारता सिखाने के लिए माता – पिता को चाहिए कि बचपन से ही उन्हें सामूहिक जीवन का महत्व बताएं और उन्हें यह बताएं कि कोई भी मनुष्य जीवन में अकेला नहीं रह सकता। जब भी कोई भलाई करता है तो न केवल यह कि वो स्वंय को पहले से अधिक सक्षम पाता है बल्कि उसमें आत्म सम्मान की भावना भी पनपती है। अधिकॉंश बच्चे लगभग ३ वर्ष की आयु से ही अपनी समरस्ता तथा दया की भावना का प्रदर्शन करने लगते हैं।

यही वो समय है कि जब बच्चा उदारता की भावना को सीखता है।उदार तथा दयालु बच्चे शीघ्र यह सीख लेते हैं कि अपने खाने की वस्तुओं, कपड़ों तथा खिलौनों को अपनी आयु के दूसरे बच्चों के साथ बाटना चाहिए। इस प्रकार वे मित्रता तथा सामाजिक संबंधों को विकसित करते हैं। अलबत्ता याद रखिए कि जो चीज़ें बच्चों को बेहद प्रिय हैं उन्हें दूसरों को देने पर उन्हें कभी विवश न करें।

अधिकांश बच्चे अपनी चीज़ों को दूसरों के साथ बॉंटने में रूचि रखते हैं परन्तु यदि स्वंय इसके लिएपहल करें तो हमें उनकी सहायता करनी चाहिए।सभी बच्चे स्वाभविक रूप से एक विशेष आयु में अपने खिलौने तथा चीज़ें दूसरों को नहीं देते हैं। इस लिए उस समय तक धीरज रखिए जब अचित समय आ पहुंचे। अधिकॉंश लोग यह समझते हैं कि बच्चे ३,४ वर्ष की आयु तक बहुत से मामलों को ठिक से नहीं समझते हैं।

साधारणत: १८ महीने से कम के बच्चे अपनी चीज़ें दूसरों को दे देते हैं परन्तु फिर उसे वापस ले लेते हैं। वस्तुत: इस आयु में बच्चों को अपनी चीज़ों में दूसरों को भागीदार बनाने के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता। आप उसके हाथ में चीज़ें दें और उसे वापस लेकर बच्चे की प्रतिक्रिया देखें। बच्चा जैसे ही स्वामित्व का अर्थ समझ लेगा अपनी चीज़ वापस नहीं करे गा। यदि अपने बच्चे से पूछे बिना आप अपने बच्चे के खिलौने अपने अतिथि के बच्चे को दे देंगे तो उसे बहुत बुरा लगेगा। परन्तु यही काम यदि उससे पूछ कर और उसकी इच्छा से किया जाए तो बच्चा एक प्रकार के अमिभान का आभास करेगा और प्रसन्न होगा।

बच्चे धीरे धीरे दूसरों की भावनाओं तथा स्नेह को समझने लगते हैं और उनका सम्मान करते हैं। परन्तु उद्देश्य पूर्ण तथा सुव्यवस्थित प्रशिक्षण द्वारा उनमें शिष्टाचारिक गुणों का पोषण किया जा सकता है