दिव्या जी की दी गयी ईद ए कुर्बान की मुबारकबाद और उसपे कमेन्ट आप्शन बंद जैसी मजबूरी देख के अफ़सोस हुआ. कमेन्ट आप्शन बंद का कारण जो बताया गया वो उचित ही है. मुझे यह देख के अच्छा लगता है की एक इंसान किसी की भी जान जाते देख दुखी होता है यहाँ तक की जानवर की भी जान जाते देख उसे ना मारने की नसीहत देता है. यह भी इंसानियत की एक मिसाल है. आशा है ऐसी नसीहत केवल बकरा ईद पे ही नहीं पूरे साल दी जाती रहेगी और इस समाज मैं सभी धर्म के लोगों से मांसाहार ना करने का अनुरोध किया जाता रहेगा.
यदि किसी को भी मांसाहार पसंद नहीं और उसे दुःख का एहसास होता है तो इसमें बुराई क्या है और किसी को बहस करने का भी अधिकार नहीं है.हाँ यह और बात है की हर इंसान किसी भी कर्म को अपने ज्ञान के अनुसार ही तौलता है. जीवहत्या , मांसाहार पे कोई स्वस्थ लेख़ लिखा जाए तो अधिक ख़ुशी होगी.
ईद मुबारक कमेन्ट आप्शन बंद नहीं है


5 comments:
Khula bhi hota to kya fark padta, kyonki unke vishay ke khilaf comment to voh approve karti nahi... Jo unki chaplusi karta rahe bas vahi theek hai...
Pehli baat to yeh ki hamari aur unki soch mein farak hai, kyonki dono ke Aqeede (Vishwas), rahan-sahan, Taleem mein farak hai... Apni vishwas ko dusre ke upar kaise thopa ja sakta hai??? Islam ke anusar (balki ab to science ke hisaab se bhi) Ped-Paudho mein jaan hoti hai, aur is lihaz se unhe khana bhi Jeev Hatya hui... To fir kya khana khya jaega? Kya keval dalo ko khakar jiya jaa sakta hai???
Aur fir kya Divya jaise log Machchhar-Makkhiyan, Cockroch, Chuhen aur Chitiyan jaise jeevon ki hatya apne fayde ke liye nahi karte hain???
I read that Mubarakbaad post. Nothing is new. Why people feel proud after attacking others religion and their practices is the big question in our society?
It is better to neglect them.
मैं भी मानती हूँ कि लेखन को भावनाएं भड़काने के लिए उपयुक्त नहीं किया जाना चाहिए | किन्तु बकरा ईद पर दी जाने वाली कुर्बानी पर मेरे कुछ सवाल हैं | जिन्हें मैंने अपनी पोस्ट पर लगाया है | आपसे भी प्रार्थना कर रही हूँ कि वहां आयें और समाधान करें | यदि आप चाहें तो इस टिप्पणी को प्रकाशित न करें | लिंक दे रही हूँ
http://ret-ke-mahal-hindi.blogspot.com/2011/11/blog-post_08.html
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